श्री सोनाणा खेतलाजी (गोरा भेरूजी) और श्री काला भेरूजी का निकास काशी से हैं , काशी से बापजी मंडोर (जोधपुर) पधारे यहा पर काला गोरा माँ ब्राह्मणी , माँ चामुंडा और गणेश जी के साथ विराजमान है , मंडोर से तिकी पहाड़ी आना पधारे और यहा से सोनाणा (जूनी धाम) और सोनाणा से सारंगवास (नवी धाम) आएं ।

खेतलाजी अर्थात काला-गोरा भैरुजी मुल काशी मे स्थान है बावसी काशी से मण्डोवर पधारे (जोधपुर) जो आज बडी गादी मानी जाती है वहा बावसी मारवाड गोडवाड की भुमि पर पधारे दसुरी से ७ किमी आना के पास तीकी पहाडी गुफा मे बिराजमान हुऐ तब पुजारी केदारिया परिवार पास ही के गाव सोनाणा मे रहा करता था बावसी सपने मे आकर बोले

“है भक्त मु कालो गोरो भैरु मारी सेवा पुजा थे सब जना करोला मु तीकी पहाडी गुफा मे बिराजीयोडो हु”

तब से पुजारी परिवार द्वारा सेवा पुजा चालु हुई कही वर्षो तक बावसी की सेवा की फिर पहाडी क्षेत्र ओर घना जंगल होने से जंगली जानवरो का खतरा था ईसलिऐ सेवा पुजा बन्द कर दी थी. कही दिनो तक बावसी की पुजा नही होने की वजह से बावसी सोनाणा पधारे ओर नाग रुपी गुफा मे बिराजमान हुऐ फिर पुजारी के सपने मे नाग रुप मे आकर बोले

“हे पुजारी मु थारी सेवा पुजा ती प्रसन्न हु मु थारे गाम मे आयो हु मु थारे घर से लारे नाग रुपी गुफा मे बिराजीयोडो हु काले ती पुजा सालु करो”

फिर सोनाणा धाम प्रसिद्ध हुआ ओर कही वर्षो तक पुजारी परिवार द्वारा सेवा पुजा की गयी

बावसी क्षेत्रपाल खेतपाल भेरुबाबा खेतलाजी आदी नामो से प्रसिद्ध हुऐ फिर कुदरत ने करवट बदली पुजारी परिवार कुछ कारणवश पास ही के गाव सारंगवास मे रहने लगे ओर सारंगवास की पहाडी गुफा के निचे हमारी पुर्वज माता सती हुऐ ओर पुरा परिवार सारंगवास मे बस गये फिर बावसी सोनाणा से सारंगवास के बीच नदी से होते हुऐ खेतलाजी सारंगवास पधारे फिर बावसी को गुफा मे बेठना था ओर गुफा मे माता ब्रम्हाणी जी पहले से बिराजे हुऐ थे तो बावसी ने एक चाल खेली ओर मॉ ब्रम्हाणी के पास गुफा मे पहुच कर बोले-

“हे माॉ मु थारो लाल (बेटा) खेतलो हु
मारा साथे नदी मे डुबकी लगावा चालो”

तब माताजी खेतलाजी के साथ निचे नदी के पास गये ओर बोले की ज्यादा देर डुबकी कोन लगाता है फिर दोनो ने डुबकी लगायी माताजी तो नदी मे ही थे ओर बावसी दोडकर गुफा मे बिराजमान हो गये ओर माताजी ने देखा की खेतल कहा गया ओर ऊपर आकर गुफा मे देखा तो खेतलाजी बिराजे हुऐ थे तब खेतलाजी ने कहा

“हे मॉ मु थारो लाल हु मुझे क्षमा करना आने वाले कलयुग मे मेरा धाम प्रसिद्ध होगा ओर मेरे कुल को लोग यहा दर्शन करने आयेगे आोर जात जडोलिया का भोग लगायेगे”

“है मॉ जो भी यात्री मेरे चरण मे आयगा या शेराबन्दी जातओर बेटा होने पर जडोलिया (बाबरी) की जात देने आयेगे तब मेरे साथ आपके भी बराबर भोग लगेगाओर जो भी दर्शन करने आयगा वो दो नारियल चढायेगा ऐक आपके ओर ऐक मेरे”

सारंगवास मे ऊपर नाग रुपी गुफा मे खेतलाजी का मन्दिर हैओर निचे मॉ ब्रम्हाणी का मन्दिर है
फिर बावसी पुजारी के सपने मे आये ओर बोले

“हे पुजारी मु कालो गोरो खेतलो थारी सेवा थी मु प्रसन्न हु?”

मेरी पुजा तुम केदारिया परिवार ही करोगे ओर आने वाले कलयुग मे भी तुम ही करोगे ओर मे सारंगवास की पहाडी गुफा मे बिराजमान हु मॉ ब्रम्हाणी के साथ तब पुजारी सुबह उठकर ऊस पहाडी गुफा मे देखा तो भगवान गणेशजी,हनुमानजी ओर मॉ ब्रम्हाणी के साथ बिराजे हुऐ थे तब से सारंगवास मे पुजा शुरु हुई ओर सोनाणा खेतलाजी सारंगवास के नाम धाम प्रसिद्ध हुआ सोनाणा ओर सारंगवास दो धाम कहलाये सोनाणा जुनी धाम कहलाया ओर सारंगवास नयी धाम कहलाया मेन पाट स्थान सारंगवास मे ही रहा

सोनाणा ओर सारंगवास मे खेतलाजी का नाग रुपी प्राक्रतिक गुफा मन्दिर है

सारंगवास मे बावसी ६०० वर्षो से ज्यादा समय से भक्तो द्वारा पूजे जा रहे हैं

सन् 1447 मे चितोड के महाराज रायमलजी ने पुजारी परिवार केदारिया परिवार को ताम्रपत्र अर्पित किया था और सन् 1974 -75 वे वर्ष मे चेत्र शुदी ऐकम, बीज का दो दिवसिय मेला गठित किया